मीडिया की निष्पक्षता पर उठता सवाल...
अगर मीडिया द्वारा दलितों को अनदेखा किया जा रहा है तो आश्चर्य क्यों है? मीडिया स्वतन्त्र है उसको फैसला करना है कि क्या दिखाना है क्या नही ।
यह एक कड़वी सच्चाई है मीडिया की स्वतंत्रता के मायने बदल चुके हैं। उसे वही दिखाना है जिससे उसकी टी. आर. पी. में बढ़ोतरी हो। किसी चैनल की जितनी ज्यादा टी. आर. पी. (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) होगी उतने ज्यादा विज्ञापन उनको मिलेंगें। यही बात समाचार-पत्र में सर्कुलेशन से लागू होती है। अगर मैं कहूँ कि राष्ट्रीय मीडिया में सवर्णों का आधिपत्य है और दलितों की भागीदारी बहुत कम होने के कारण अनदेखा किया जा रहा तो कुछ लोग मुझ पर जातिवादी का ठप्पा लगाने से नही चूकेंगे ।
परन्तु बहुत से ऐसे सवाल मुँह बाये खड़े हैं जिनका जवाब देने की कोई हिम्मत नही दिखा रहा। दलितों के साथ हुए अत्याचार की खबर एक बार दिखाने के बाद ठन्डे बस्ते में क्यों चली जाती है?
दूसरे दिन उसका ज़िक्र तक नही होता कि उस मामले का क्या हुआ। डॉ. अम्बेडकर जयन्ती के कार्यक्रम की अच्छी तरह कवरेज क्यों नही हो पाती? मायावती की रैली की खबर एक दो चैनल को छोड़कर बाकि क्यों नही दिखा पाते? दलितों के बलात्कार की खबर दिखा दी जाती है परन्तु उनके द्वारा किये गए सहरानीय कार्य को क्यों नही? फ़िल्मी हीरो क्या पहनते हैं?,कब उठते हैं? सब जानकारी होती है लेकिन आम इन्सान की जिंदगी की समस्या की जानकारी क्यों नही होती? बहुजन समाज मीडिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है परंतु इसके सीरियल , न्यूज़ , नाटक में इनका जीवन दिखाई क्यों नही देता? मंत्रियों की पार्टी में क्या बना? किसने क्या खाया? ये तो पता है परंतु कहीं चूल्हा तक नही जला उसकी किसी को खबर तक क्यों नही? हाँ, मीडिया स्वतन्त्र है अगर किसी दलित मामले को दिखाया भी जाता है तो आधी अधूरी कवरेज की जाती है। मामले की तह तक पहुँचने की कोशिश नही की जाती है। निष्पक्षता शब्द मीडिया की डिक्शनरी से विलुप्त सा हो गया है। राष्ट्रीय अखबारों में दलित मुद्दों को कितनी जगह मिलती है आप खुद देख सकते हैं। राष्ट्रीय चैनलों पर दलित मुद्दों पर बहस देखने को नही मिलती। कुछ एक चैनल व पत्र दलितों के साथ न्याय कर रहे हैं उनसे माफ़ी चाहूँगा। बहुजनों को अपना मीडिया स्थापित करने की आवश्यकता है । तभी समाज की सही तस्वीर सामने आ सकती है। - संदीप मेहूवाला एम.ए. (पत्रकारिता एवं जन संचार)
दूसरे दिन उसका ज़िक्र तक नही होता कि उस मामले का क्या हुआ। डॉ. अम्बेडकर जयन्ती के कार्यक्रम की अच्छी तरह कवरेज क्यों नही हो पाती? मायावती की रैली की खबर एक दो चैनल को छोड़कर बाकि क्यों नही दिखा पाते? दलितों के बलात्कार की खबर दिखा दी जाती है परन्तु उनके द्वारा किये गए सहरानीय कार्य को क्यों नही? फ़िल्मी हीरो क्या पहनते हैं?,कब उठते हैं? सब जानकारी होती है लेकिन आम इन्सान की जिंदगी की समस्या की जानकारी क्यों नही होती? बहुजन समाज मीडिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है परंतु इसके सीरियल , न्यूज़ , नाटक में इनका जीवन दिखाई क्यों नही देता? मंत्रियों की पार्टी में क्या बना? किसने क्या खाया? ये तो पता है परंतु कहीं चूल्हा तक नही जला उसकी किसी को खबर तक क्यों नही? हाँ, मीडिया स्वतन्त्र है अगर किसी दलित मामले को दिखाया भी जाता है तो आधी अधूरी कवरेज की जाती है। मामले की तह तक पहुँचने की कोशिश नही की जाती है। निष्पक्षता शब्द मीडिया की डिक्शनरी से विलुप्त सा हो गया है। राष्ट्रीय अखबारों में दलित मुद्दों को कितनी जगह मिलती है आप खुद देख सकते हैं। राष्ट्रीय चैनलों पर दलित मुद्दों पर बहस देखने को नही मिलती। कुछ एक चैनल व पत्र दलितों के साथ न्याय कर रहे हैं उनसे माफ़ी चाहूँगा। बहुजनों को अपना मीडिया स्थापित करने की आवश्यकता है । तभी समाज की सही तस्वीर सामने आ सकती है। - संदीप मेहूवाला एम.ए. (पत्रकारिता एवं जन संचार)

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