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''दास्तां-ए-हालात''
Wednesday, 8 March 2017

बहुजन समाज की पत्रकारिता में हिस्सेदारी जरुरी क्यों ?

आज हर वर्ग के लिए मीडिया एक जरुरत बन गया है। सभी वर्गों ने अपनी जरूरत के अनुसार मीडिया में अपनी भागीदारी भी कायम कर ली है। मीडिया ने जब से व्यापार का रूप लिया है इसके मायने ही बदल गए हैं। अपनी भागीदारी के मामले में दलित सबसे पीछे हैं। मीडिया की महत्ता को देखते हुए डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने पत्रकारिता के माध्यम से समाज को संगठित करने की कोशिश की थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने 'मूकनायक'(1920) , 'बहिष्कृत भारत'(1927), 'समता' (1930), 'जनता' एवं 'प्रबुद्ध भारत' ( 1956) समाचार-पत्र प्रकाशित किये। मान्यवर कांशी राम ने भी प्रचार के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया। आजादी से पहले व आजादी के बाद अनेक दलित पत्रकार हुए , अनेक समाचार-पत्र निकले गए परन्तु आर्थिक कमजोरी के कारण सभी ने दम तोड़ दिया। कुछ ने कई वर्षों तक सफल प्रकाशन भी किया । अगर आज की बात करें तो भी राष्ट्रीय मीडिया में दलितों की भागीदारी न के बराबर है। आज बहुजन न्यूज, नेशनल दस्तक ,दलित दस्तक, दलित मंच आदि दलित चेतना के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दलित पत्रकारिता के लिए यह एक घोर चिन्तन का विषय है।राष्ट्रीय मीडिया में एक भी दलित चैनल नही है। आजादी के इतने वर्ष बाद भी यह क्यों संभव नही हो पाया? अपने मीडिया के बिना अपने विचारों को लोगों तक पहुँचा पाना मुश्किल है। इसी कारण स्वतन्त्रता संग्राम में शहीद हुए झलकारी बाई, बिरसा मुंडा, मातादीन भंगी, टंट्या, मदारी पासी, महंगू राम आदि अनेक बहुजन सैनिकों के नाम इतिहास से गायब है। इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस होनी चाहिए। देश के कोने-कोने में कार्य कर रहे बहुजन संगठनों को इस मुद्दे को अपनी मुख्य विचारधारा में रखना चाहिए। पत्रकारिता में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरुरत है। अगर इस पर लगन से काम किया जाता है तो वो दिन दूर नही जब समाज को डॉ. अम्बेडकर, पेरियार रामास्वामी, शाहू जी महाराज, ज्योतिबा फूले आदि महापुरुषों पर नाटक, फिल्में, वृत चित्र प्रचुरता में देखने को मिलेंगे। दलितों पर हुए अत्याचार ही नही उनके द्वारा किये गए महान कार्यों की हैडलाइन अख़बारों में देखने को मिलेगी। बहुजन कार्यक्रमों की लाइव कवरेज दिखेगी। टी.वी. चैनलों में जमींनी स्तर से जुड़े लोगों की जिंदगी दिखाई देगी। परन्तु इसके लिए आगे आकर कार्य करने की जरूरत है। दलित नेताओं को इसके लिए उपयोगी कदम उठाने होंगें तभी दलितों का अपना मीडिया स्थापित हो सकता है। - संदीप मेहूवाला (एम.ए.पत्रकारिता एवं जन संचार)

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