जाति के बिना मेरा वजूद क्या है ?
इस पोस्ट के शीर्षक 'जाति के बिना मेरा वजूद क्या है ?' का उत्तर आज के सामाजिक परिदृश्य पर दूँ तो मेरा वजूद कुछ भी नहीं है। ये सिर्फ मेरा उत्तर नही है आप सब की जिंदगी में भी यही होगा। मैं जहाँ भी जाता हूँ मुझसे मेरा परिचय पूछा जाता है तो अपना नाम ,गांव का नाम, मेरी योग्यता सब बता देने के बाद भी मेरा परिचय अधूरा ही रहता है जब तक मैं अपनी जाति न बता दूँ। दूसरी तरफ अगर शुरू में ही जाति बता दूँ तो कुछ भी बताने की जरूरत नही रहती । जिस गांव में हमारा परिवार पिछले 100 वर्षों से रह रहा है उनका कोई भी वजूद नही है। गांव में मैं अपने पिताजी ,दादाजी का नाम बताता हूँ तो कोई मुझे नही पहचानता अगर मैं अपनी जाति ना बताऊँ।
जिस समाज को उसकी जाति के कारण दबा कुचला जीवन जीने के लिए विवश किया गया।जिसे समाज में समानता के हक से दूर रखा गया। अगर आज वह समाज उस अपमान को भुला कर बराबरी के लिए कुछ विशेष हक पाने की कोशिश कर रहा है तो उसे जातिवाद फैलाने का दोष दे कर किनारे करना कहाँ तक उचित है। हम जाति खत्म करने के लिए तैयार है लेकिन पहले आप हमें बराबरी में आने तो दीजिये। आज देश में कोई जातिवादी भेदभाव नही है इस बात का दम भरने वाले बहुत हैं लेकिन आज भी यह समाज हुक्के को साँझा नही कर पाया। इस का जवाब दे पाना मुश्किल है कि इस के पीछे कौन सी मानसिकता काम कर रही है।
जल्द ही 'जाति के बिना मेरा वजूद क्या है' शीर्षक से मेरी कविता आप के बीच में होगी । आप से अनुरोध है कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मेरा सहयोग करें ।
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