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''दास्तां-ए-हालात''
Friday, 2 March 2018

“बुरा ना मानो होली है” की आड़ में मनचलों का स्तनदाब वहशियत

होली की आड़ में मनचले करते है वहशियत की सारी हदें पार 

होली विभिन्न रंगो का त्यौहार रहा है, और इसे भारत और नेपाल में बड़े धूमधाम से मनाते है लेकिन ऐसा नही है कि केवल भारत और नेपाल ही इस पर्व को मना सकते है! कई बार सीरिया, म्यांमार जैसे देश भी इस खूनी होली से बचे नहीं हैं। अब इसे मनाने के लिए किसी होलिका को जलाने की जरूरत नहीं, जिंदा इंसानों का जला देने से ही काम चल जाता है। हां, कभी-कभी इसका रंग-रूप बदल जरूर जाता है, मसलन जातिगत खूनी होली, धार्मिक सौहार्द व दंगे-फसाद की होली, स्थानीय विशेष की होली, लव जिहादी होली, लोगों के उजाड़न की होली। ऐसी होली किसी धर्मविशेष से नहीं जुड़ी होती, इसके लिए राजनीतिक धर्म ही सर्वोपरि है। कहन को होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला भारतीय लोगों का त्योहार है लेकिन खूनी होली देश से लेकर विदेशों में आए दिन खेली ही जाती है जिसके लिए किसी खास मौसम की जरूरत नहीं। अपने यहां पीकर मासूमों को रौंद देने भर से, भूख के लिए चोरी करने पर मार देने से, सांप्रदायिक पिचकारी से खूब खूनी होली खेली जा रही है। और इस धर्म का ताँता बाना कौन बुनता है, किसके द्वारा बुना जाता है इसे आप भली भांति जानते है, मैं स्पष्ट लिखने में भी इसलिए कतरा रहा हूँ क्यूंकि अब कलम पर भी एक विशेष तबके ने अपनी पैठ जमा ली है जिससे की अब पत्रकार खिलाफ लिखने से भी कतराते है, खैर ऐसा नही है कि सभी एक जैसे है!!
मेरा मानना है कि आपको होली पर्व मनाने से पहले जानना चाहिए कि
आखिर होली पर्व मनाते क्यों है ?
होली मनाने के पीछे कारण क्या है ?
होलिका कौन थी ?
होलिका को क्यों जलाया गया ?
प्रह्लाद कौन था, वो आग में क्यों नही जला ?
होलिका के साथ उसका क्या सम्बन्ध था ?
हिरण्यक्श्चप कौन था ? आदि प्रश्नों के जवाब आपको जानने चाहिए...

खैर, आशा करता हूँ कि आप इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए थोडा प्रयास करेंगे, यथार्थ वर्तमान का दृश्य देखे तो एक विशेष तबके को छोड़कर सभी होली/फाग खेलने में मशगुल है और इस मशगुल में किसके साथ क्या क्या घटित हो रहा है इस सबको दरकिनार करके हम मस्ती में मशगुल होते है
लेकिन मैं आपको बीते दो दिन पहले की ही सच्ची घटना बताना हूँ की दिल्ली के ही एक इलाके में कुछ मनचलों ने “बुरा ना मानो होली है’ की आड़ में लड़की के कूल्हों पर वीर्य (स्पर्म) से भरे गुब्बारे फैंके, कितना गन्दा और असहनीय कृत्य लग रहा है लेकिन ये उपज भी आप लोगो की है, अक्सर लडको के बारे में ऐसा कहा जाता है की अपने लडको को ऐसा बनाएगा की उन्हें देखकर लड़की अपने बाल ठीक करें न की दुप्पटा लेकिन यह सोच अभी भी किताबो या भाषणों तक ही सिमित है, बरहाल आप अपने आसपास के माहोल को भी देखते होंगे जिसमे “बुरा ना मानो होली है” का सहारा लेकर महिलाओ/ लड़कियों के साथ अभद्रता करने का मामला सामने आता है और यदा कदा मौका लगने पर स्त्री के नितम्ब को दबाना भी बुरा ना मानो होली है में शामिल हो जाता है, और इसका न तो विरोध किया जाता है और न इसे घिनोने कृत्य में शामिल किया जाता है इसलिए महिलाओं/ लड़कियों को इस कृत्य पर सोचने व समझने की जरूरत है जिससे की मनचलों के बढ़ते साहस को रोका जा सके!!


(इसी सोच और विचार के साथ मैं आशा करता हूँ कि मेरे द्वारा यदा कदा लिखे जाने वाला लेख आपको पसंद आया होगा, आपका अपना मित्र संदीप कोली)
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